ब्रह्मांड ,नवग्रहों और नक्षत्रों का मानव जीवन पर प्रभाव।

ब्रह्मांड ,नवग्रहों और नक्षत्रों का मानव जीवन पर प्रभाव।
ब्रह्मांड ,नवग्रहों और नक्षत्रों का मानव जीवन पर प्रभाव।

ब्रह्मांड ,नवग्रहों और नक्षत्रों का मानव जीवन पर प्रभाव।

ग्रहों और नक्षत्रों का मानव जीवन पर सीधा असर पड़ता है। यह करोड़ों मिलो की दूरी होने पर भी अपनी उपस्थिति का स्पष्ट एहसास कराते हैं।

जहां चंद्रमा मन को गहन शीतलता प्रदान करता है, वही सूर्य तन को तपा देने वाली गर्मी का उत्पादक है। आकाश मंडल में सूर्य सबसे महत्वपूर्ण ग्रह है। मानव चर अचर यहां तक की जड़ पदार्थों पर भी सूर्य के तेज का प्रभाव पड़ता है। अंततः पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक जीव ,जंतुओं का संबंध सूर्य एव सूर्य के चारों ओर भ्रमण करते ग्रह ,नक्षत्रों से है।

इस संसार का हर प्राणी किसी ना किसी ग्रह से जुड़ा होता है और इन ग्रहों की शुभ अशुभ अवस्था दशा अंतर्दशा महादशा आदि का प्रभाव उस पर अवश्य ही पड़ता है ग्रह संख्या में 9 है। सूर्य ,चंद्र ,मंगल ,बुध ,बृहस्पति ,शुक्र ,शनि ,राहु व केतु। इनमें से राहु व केतु को छाया ग्रह माना जाता है। इनका अपना कोई प्रभाव नहीं होता। यह जिस ग्रह के साथ होते हैं ,वैसा ही प्रभाव देते हैं। ग्रह शांति करने व उनके अनिष्टकारी प्रभाव का शमन करने हेतु नवग्रह पूजन व उपासना ,आराधना का अपना धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व है।


हमारे ऋषि-मुनियों ने नवग्रह पूजन के यंत्रों का निर्माण किया और मंत्रों की रचना कर इनके अनिष्ट निवारण का सरल उपाय जन सुलभ कराया। किसी भी शुभ कार्य को करने से पूर्व नवग्रह शांति विधान कि हमारे देश में प्राचीन परंपरा रही है और ज्योतिष के क्षेत्र में भी इसका महत्व सर्वाधिक है।

ब्रह्मांड में नवग्रहों का अस्तित्व:

पृथ्वी से आकाश तक समस्त क्षेत्र ,जो हमें दृष्टिगत होता है वह तथा उसके अतिरिक्त वह क्षेत्र भी जो अस्तित्व में तो है ,परंतु दूरी या अन्य किसी व्यवधान के कारण तत्काल दृष्टिगोचर नहीं होता ,ब्राह्मण कहलाता है। जैसे पृथ्वी विश्व का एक अंग है ,उसी तरह विश्व ब्रह्मांड का एक खंड है। इस तरह ब्रह्मांड का क्षेत्र सर्वाधिक विस्तृत है। विश्व उसका मात्र एक भार है ,और पृथ्वी विश्व का एक क्षेत्र।

रात के समय हमें आकाश में छोटे-बड़े अनगिनत तारे दिखाई पड़ते हैं उनके अलावा हजारों तारे और भी हैं ,जो दूरी के कारण दिखाई नहीं पड़ते।
नभोमंडल में 9 विशालकाय तारों को ग्रहों की संज्ञा दी गई है। इनमें सात प्रमुख हैं-सूर्य, चंद्रमा, मंगल ,बुध ,बृहस्पति ,शुक्र ,शनि ,इनके अतिरिक्त दो अन्य छाया ग्रहों की भी कल्पना की गई है राहु और केतु।

यही 9 वृद्धाकार तारे नवग्रह कहलाते हैं। सूर्य को ब्रह्मांड का सबसे विशाल ,ज्वलंत और प्रत्यक्ष ग्रह माना गया है। अन्य ग्रह इसकी शक्ति से संबद्ध होने के कारण इसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते रहते हैं। सूर्य को ग्रहराज अथवा ग्रहाधिपति भी कहा जाता है। उससे सम्बृद उपरोक्त 8 तारे सौर परिवार के सदस्य माने जाते हैं।
इस प्रकार सौर परिवार का अर्थ है – सूर्य और उससे संबंधित आठ ग्रहों- चंद्र ,मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि ,राहु और केतु का समूह।

आकाश में स्थित लाखों मील के दायरे में फैले हुए तारामंडल को विवेचना की सुविधा के लिए 27 प्रमुख समुहों विभक्त किया गया है ,जिन्हें नक्षत्र कहा जाता है। प्रत्येक नक्षत्र का एक विशिष्ट नाम ,रूप ,प्रभाव ,क्षेत्र तथा तारा समूह निर्धारित किया गया है।

आकाश में स्थित सभी तारे सीधे अथवा अन्य ग्रहों के माध्यम से सूर्य से ही संबंधित है। सौर परिवार में इन सभी की गणना की जाती है। किंतु जहां तक सौरमंडल की बात है ,उसमें सूर्य और उससे संबंधित उपरोक्त आठ ग्रहों की गणना होती है।

ग्रहों के अलावा 27 नक्षत्र इस प्रकार हैं

  • अश्विनी
  • भरणी
  • कृतिका
  • रोहिणी
  • मृगशिरा
  • आर्द्रा
  • पुनर्वसु
  • पुष्य
  • अश्लेषा
  • मघा
  • पूर्वाफाल्गुनी
  • उत्तराफाल्गुनी
  • हस्त
  • चित्रा
  • स्वाति
  • विशाखा
  • अनुराधा
  • ज्येष्ठा
  • मूल
  • पूर्वाषाढ़ा
  • उत्तराषाढ़ा
  • श्रवण
  • धनिष्ठा
  • शतभिषा
  • पूर्वाभाद्रपद
  • उत्तराभाद्रपद
  • रेवती

राशियों की भांति नक्षत्रों के भी स्वामी होते हैं जैसे:

  • अश्विनी के अश्विनी कुमार
  • भरणी के काल
  • कृतिका के अग्नि
  • रोहिणी के ब्रह्मा
  • मृगशिरा के चंद्रमा
  • आद्रा के रूद्र
  • पुनर्वसु के आदित्य
  • पुष्य के बृहस्पति
  • अश्लेषा के सर्प
  • मघा के पितर
  • पूर्वाफाल्गुनी के भग
  • उत्तराफाल्गुनी के अर्यमा
  • हस्त के सूर्य
  • चित्रा के विश्वकर्मा
  • स्वाति के पवन
  • विशाखा के शुक्रागनि
  • अनुराधा के मित्र
  • मूल के नैऋति
  • जयेष्ठा के इंद्र
  • पूर्वाषाढ़ा के जल
  • उत्तराषाढ़ा के विश्वदेवा
  • श्रवण के विष्णु
  • धनिष्ठा के वसु
  • पूर्वाभाद्रपद के अजैकपाद
  • उत्तराभाद्रपद के अहिबुधन्य
  • शतभिषा के वरुण
  • रेवती के पुषा
  • अभिजीत के ब्रह्मा

जिस तरह शुभ और अशुभ ग्रहों का प्रभाव मानव पर पड़ता है। उसी प्रकार शुभ अशुभ नक्षत्र भी अपना प्रभाव डालते हैं। नक्षत्रों के देवताओं के स्वभाव अनुसार नक्षत्रों के भावी शुभ और अशुभ फल का विचार किया जाता है।

पंचक : धनिष्ठा ,शतभिषा ,पूर्वाभाद्रपद ,उत्तराभाद्रपद ,और रेवती, नक्षत्रओं को पंचक कहा जाता है। यह अशुभ फलदायक होते हैं।

यदि किसी बच्चे का जन्म जयेष्ठा, अश्लेषा ,रेवती ,मघा ,मूल और अश्विनी नक्षत्रों में होता है तो 27 दिन बाद फिर वही नक्षत्र आने पर ग्रह शांति कराई जाती है। यह नक्षत्र मूल संज्ञक नक्षत्र कहे जाते हैं।

उत्तराफाल्गुनी ,उत्तराषाढ़ा ,उत्तराभाद्रपद और रोहिणी नक्षत्र भी अशुभ माने जाते हैं

मूल, जेष्ठा ,आद्रा और अश्लेषा पीड़ादायक नक्षत्र हैं।

मृगशिरा, रेवती, चित्रा और अनुराधा सामान्य ,तथा हस्त ,अश्विनी ,पुष्प और अभिजीत ,शुभ नक्षत्रों के रूप में जाने जाते हैं।

प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में नक्षत्रों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रत्येक मांगलिक कार्य जैसे गृहआरंभ, गृह प्रवेश ,यात्रा, अन्नप्राशन, विद्यारंभ ,मुंडन तथा विवाह आदि के लिए मुहूर्त का आश्रय लेते समय नक्षत्रों की गणना की जाती है।

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