क्वार्ट्ज-स्फटिक रत्न के लाभ-स्फटिक की माला पहनने के फायदे

क्वार्ट्ज

इसे कई नामों से जाना जाता है,जैसे क्वार्ट्ज,क्रिस्टल,बिल्लौर, स्फटिक आदि।

इस प्रकार के कई पत्थर हैं ,जिनको विभिन्न नामों से जेवरों, हार ,सिंगार और जीवन उपयोगी वस्तुएं बनाने में काम में लाया जाता है। बिल्लौर(क्वार्ट्ज) कटीला, यशब,रतवा आदि पत्थर सब क्वार्ट्ज के रूप हैं क्रिस्टल प्रकार के क्वार्ट्ज के 6 कोण और 6 तल होते हैं। बिल्लौर (क्रिस्टल या क्वार्ट्ज) के प्रकार के पत्थर तो बहुत बड़े बड़े साइज में मिलते हैं। क्रिस्टल के पत्थर में आर पार देखा जा सकता है।

बिल्लौर, क्रिस्टल यह भी क्वार्ट्ज के प्रकार का एक बहुत प्रसिद्ध पत्थर है। इसको संस्कृत में फिटिक या स्फटिक कहते हैं। यह शीशे की भांति बहुत सख्त और साफ पत्थर होता है। शीशे की भांति इसके आरपार भी देखा जा सकता है। यदि इसको सान पत्थर से रगड़ा जाए तो ,यह घिसता नहीं है परंतु शीशा घिस जाता है।

स्फटिक एक बहुत अल्प मूल्य का रत्न है। इसको बिल्लौर भी कहते हैं। यह मार्केट में रत्न के रूप में तथा इसकी बनी मालाएं भी मिलती है। इसको शांति का रत्न माना जाता है। इसको धारण करने से अधिक गुस्सा आना बंद हो जाता है या क्रोध कम आता है। औरत हो या पुरुष कोई भी इस रत्न की माला को धारण कर सकते हैं।

रुद्राक्ष और स्फटिक दोनों की मिली हुई माला धारण करने से सुख ,शांति के अलावा रोजी-रोटी के साधनों में बहुत लाभ मिलता है। इसके धारण करने से मन में पवित्र विचार व्यक्त ही उत्पन्न होते है। औरतों के लिए इस रत्न की माला बहुत शुभ रहती है। उनको स्वास्थ्य ठीक रखने में ,तथा उनके आत्मबल को बढ़ाने में ,उनकी चिंताएं दूर करने में अधिक सहायक होती है।

कीमती रत्नों के कई विशेषज्ञों का मत है कि , पहाड़ जहां दिन-रात हजारों वर्षों तक बर्फ पड़ती रहती है। हजारों वर्षों तक बर्फ जमी रहने के कारण सबसे नीचे की बर्फ क्वार्ट्ज का रूप धारण कर लेती है।

यदि क्वार्ट्ज के नीचे कोई रंगीन वस्तु रखी जाए तो वह सफेद ही दिखाई देती है। परंतु शीशे के नीचे रखने पर उस वस्तु का रंग दूसरी और साफ साफ दिखाई देता है। क्वार्ट्ज का स्वाद फीका होता है। परंतु इस को खाना बहुत हानिकारक है। वैध,हक़ीम इसको सुरमें की भांति पीसकर और कपड़े से छानकर ,सुरमा बनाते हैं। वह सुरमा आंखों में सफेदी आ जाना ,पलकों की खुजली आदि ,आंखों के रोगों में बहुत लाभप्रद होता है।

क्वार्ट्ज साफ स्वच्छ और छूने पर बहुत नरम और ठंडा प्रतीत होने के कारण शीशे की अपेक्षा बहुत अधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। साधारण शीशे की बजाय यदि क्वार्ट्ज से चश्में बनाएं जाए तो अधिक लाभकारी और टिकाऊ होते है।

क्वार्ट्ज हिमाचल ,चीन ,तिब्बत ,नेपाल के हिम पर्वतों में मिलता है। प्रसिद्ध रोमन लेखक प्लोनी ने लिखा है कि आज से 2000 वर्ष पहले रूम के धनवान क्वार्ट्ज के बर्तन ,प्याले आदि बनवाते थे। इसको गले में लटकाने या पास रखने से बच्चे रात को नहीं डरते और चीख नहीं मारते। इसको पास रखने से रात को नींद में डरावने सपने नहीं आते और नींद में बेचैनी दूर होकर गहरी नींद आ जाती है।

क्वार्ट्ज से बनी माला से बार बार जप और ईश्वर को याद करने से मन की शांति और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।

पहाड़ों की चट्टानों से निकलने वाले क्वार्ट्ज को तांत्रिक ,ज्योतिषी और आध्यात्मिक विद्या के विशेषज्ञ भविष्य की बातें बताने वाला शीशा बनाते हैं। निरंतर अभ्यास से तांत्रिक विद्या के विशेषज्ञ इस शीशे को देखकर दूर-दूर के दृश्य देख लिया करते थे और प्रश्न करता के सभी प्रश्नों के उत्तर बता दिया करते थे। हजारों वर्षों से इस शीशे की सहायता से भविष्य की बातें बताई जा रही है। कहते हैं कि जापान में बौद्ध मंदिरों के पुजारी, ईश्वर की खोज करने वाले इस पत्थर को सामने रखकर प्रैक्टिस करके ईश्वर को दर्शन कर लेते थे। दूर-दूर के वृतांत व दृश्य अपनी आंखों से देख लेते थे।

इस उद्देश्य के लिए वह शुद्ध क्वार्ट्ज का शीशा या स्फटिक का शिवलिंग बनवाकर उस पर ध्यान लगाकर या कमरे में अपनी आंखों की सीध में रखकर टकटकी बांधकर निर्धारित समय तक उसको निरंतर देखते रहते हैं। इस प्रकार निरंतर अभ्यास से उनके प्रश्न ,प्रार्थना ,इच्छा का उत्तर इस क्रिस्टल में साफ-साफ दिखाई देने लग जाता है।

मिस्मेरेजम, हमजाद योग विद्या में भी कमरे में एक तख्ती जिस पर एक काला बिंदु होता है या मोमबत्ती जलाकर सामने रखकर मनुष्य घंटों तक उसको देखता रहता है। जिससे मन की एकाग्रता प्राप्त होती है। यह सब कुछ योग्य गुरु के आदेश अनुसार करने पर शीघ्र सफलता प्राप्त होती है। जो व्यक्ति इसमें निपुण हो जाता है, उसको ही इस विद्या से आनंद प्राप्त होता है। केवल पढ़ने या बातें करने से इस प्रकार की आध्यात्मिक शक्तियां प्राप्त नहीं होती।

कई दूसरे कीमती पत्थर और विधियां आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाई जाती हैं। हरियालीयुक्त क्वार्ट्ज भी इस उद्देश्य के लिए प्रैक्टिस करने के लिए रखे जाते हैं। कई भविष्यवक्ता प्रश्न करने वाले को सिद्ध किया हुआ आध्यात्मिक शक्ति से पूर्ण क्रिस्टल पत्थर दे देते हैं और उसको कुछ मिनट तक उसमें देखने को कहते हैं। उनका विचार है कि ऐसा करने से उस पत्थर में प्रश्न करता से संबंधित चुंबकीय और आध्यात्मिक शक्तियां केंद्रित हो जाती हैं ,जिससे साधक उसके प्रश्नों और उसके भूत और भविष्य का वृतांत सही सही बतला सकता है।

बैधनाथ आदि कंपनियों की स्फटिक की भस्म के नाम से इसी रत्न की बनी औषधि बाजार में मिलती है। 3 रत्ती से 5 रत्ती प्रति मात्रा में शहद तथा अदरक के रस के साथ दिन में 2 बार अथवा वैध की राय के अनुसार लेने से कफ विकार के कारण खांसी आदि में लाभ मिलता है। ज्वर एवं निमोनिया में भी इसके सेवन से लाभ होता है। मुंह में दाने और घाव होने पर यह भस्म डिस्टिल्ड वाटर में डालकर धोने से घाव में आराम मिलता है। यह रत्न शुक्र का उपरत्न है। हीरे के बदले में स्फटिक की अंगूठी मध्यमा उंगली में तथा इसकी माला गले में धारण से बहुत लाभ प्राप्त होता है।

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