वृष लग्न | वृष लग्न के जातक | वृष लग्न विश्लेषण

वृष लग्न | वृष लग्न के जातक | वृष लग्न विश्लेषण
वृष लग्न

वृष लग्न

साथियों , इस पोस्ट में हम यह जानेंगे जिन व्यक्तियों का जन्म “वृष लग्न में” होता है वह दिखने में कैसे होते हैं, उनका स्वभाव कैसा होता है, उनकी आजीविका क्या हो सकती है आदि। तो आइये जानते है- वृष लग्न | वृष लग्न के जातक | वृष लग्न विश्लेषण

वृषभ लग्न क्या होता है?

बैल की आकृति के समान चिन्ह वृषभ लग्न होता है।

वृषभ लग्न के लोग कैसे होते हैं?

आत्मविश्वास के धनी एव कर्मप्रधान होते हैं।

वृष राशि में कौन कौन से नाम आते हैं?

ई ,ऊ ,ए ,ओ ,वा ,वी ,वू ,वे ,वो ,ब


वृष लग्न,आकृति।

वृषभ लग्न व्यक्तित्व विशेषता- छोटा या मंझोला कद, मोटा शरीर जिससे व्यक्ति कुछ-कुछ वर्गाकार अर्थात लंबाई चौड़ाई बराबर जैसे दिखाई देता है, बड़ा व आकर्षक और लगभग वर्गाकार चेहरा, माथा पूरा भरा हुआ, मोटे होंठ, आंखें, कान आदि अपेक्षाकृत बड़े, नाक कम नोकदार यहां थोड़ी मोटी, बाल घने काले होते हैं। हथेलियां अपेक्षाकृत चौड़ी होती है। सामान्यत उनके चेहरे या कमर पर तिल या मस्से का निशान पाया जाता है। उनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है।

वृषभ का अर्थ बैल होता है, इसलिए इस लग्न में जन्मे जातकों का वृषभ की आकृति से साम्य होना स्वाभाविक है। ऐसे जातक का कद ठिंगना, पुष्ट एव स्थूल शरीर होता है, परंतु शारीरिक रूप से बलिष्ट एव पुरुषार्थी होते हैं। इनका रंग साफ अर्थात गेहूंआ होता है तथा यह आत्मविश्वास के धनी एव कर्मप्रधान होते हैं। इनके होठ कुछ मोटे होते हैं तथा कान एव गर्दन कुछ लंबी होती है,पर आंखें और गाल मोहक तथा तेजस्वी दिखते हैं।

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वृष लग्न,मानसिक प्रवृत्ति।

वृष लग्न के जातक अड़ियल, अभिमानी और महत्वकांक्षी होते हैं। सामान्यतः वे संयत, मधुर व्यवहार करने वाले और मिलनसार होते हैं। दूसरों की बातें ध्यान से सुनते हैं। लेकिन कभी-कभी वे दुराग्रहपूर्ण, पक्षपातपूर्ण और अड़ियल रवैया भी अख्तियार कर लेते हैं। वह उदार और दयालु भी होते हैं। दूसरों की गलतियां माफ कर देते हैं। वह स्थाई मित्र बनाते हैं। सामान्यत उनकी बुद्धि बहुत तीष्ण होती है। उनका दिमाग व्यापार में बहुत तेज चलता है। अक्सर उन्हें घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है। वृषभ जातक अपने सिद्धांत और तरीके स्वय तय करते हैं। वह जो सोचते हैं, उस पर अमल भी करते हैं। स्वभाव से शांत प्रकृति के होते हैं तथा अक्सर भावनाओं के बजाय सत्य को वरीयता देते हैं। अगर उन्हें छोड़ा जाए, उनकी उपेक्षा या अपमान हो, उनकी बात ध्यान से ना सुनी जाए तो वह रौद्र रूप धारण कर लेते हैं और फिर बिफ़रे हुए सांड की तरह रोके नहीं रुकते।

ऐसे व्यक्ति मेहनती, स्थिर विचार वाले, सज्जन, धीर एव शांत स्वभाव वाले, स्वार्थी, कामी, इच्छा अनुसार कार्य करने वाले, ईष्यालु , तेज स्मरण शक्ति ,काव्य प्रेमी, चतुर नीतिज्ञ, और संबंधियों और मित्रों की सहायता से धन उपार्जन करने वाले होते हैं।

यदि भूलवश इनसे कोई अनुचित कार्य हो जाए, तो उसके लिए घंटों पछताते रहते हैं। ऐसे जातक संगीत एवं सौंदर्य के रसिक होते हैं।

वृषभ लग्न लग्न में जन्मे जातक अपनी शोध प्रवृत्ति के कारण नित नवीन खोज में लगे रहते हैं। अड़ियल स्वभाव का होने के कारण जो कार्य ठान लिया तो ठान लिया पीछे नहीं हटते। जब तक अपने विचारे हुए कार्य को पूरा नहीं कर लेते, चैन से नहीं बैठते। शासन कार्य करने की क्षमता इनमें होती है, पर संतान की ओर से प्राय दुखी रहते हैं।

वृषभ लग्न लग्न में जन्मे जातक जब हंसते हैं तो लुभावने लगते हैं, क्योंकि हंसने पर इनकी श्वेत धवल दंतपंक्ति इनके मुख की शोभा को बढ़ा देती है। इनका व्यक्तित्व चुंबकीय होता है। लोग बरबस ही इनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। ऐसे जातक स्वभाव से कुछ गंभीर प्रकृति के होते हैं। थोड़ा बोलकर ही अधिक कह जाना इनकी आदत होती है।

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वृष लग्न, सामान्य प्रवृत्ति

वृषभ जातक किसी भी बात के लिए किसी के मोहताज होना पसंद नहीं करते। उनकी सोच अक्सर यह होती है कि उनका जन्म दूसरों पर अपना हुकुम चलाने के लिए ही हुआ है। किसी सीमा तक उनकी यह सोच ठीक भी होती है।

विपरीत लिंगीयों के प्रति शारीरिक आकर्षण, वृषभ जातकों की सबसे बड़ी कमजोरी होती है और वे दीवानगी की हद तकइसमें डूब जाते हैं। उन्हें आसानी से व्यभिचार के लिए ललचाया जा सकता है। अपनी इस कमजोरी के चलते 50 की उम्र तक आते-आते उन्हें यौन रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

वृष लग्न के जातकों की सामान्य प्रवृत्ति पुराने संबंध छोड़ने और नए बनाने की और अधिक होती हैं। इसका कारण वृषभ जातकों की असामान्य दैहिक भोग लिप्सा भी हो सकती है।

संतान के संदर्भ में उन्हें अधिक सुख नहीं मिलता। वह सौंदर्य और संगीत के प्रेमी होते हैं।


वृषभ लग्न के जातक, रोग प्रवति

वृषभ लग्न के जातक का विकारों जैसे खांसी, नजला, जुकाम आदि से पीड़ित हो सकते हैं। इसके साथ ही अमर्यादित जीवन के परिणाम स्वरुप यौन और रतिज रोगों के शिकार भी बन सकते हैं।

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वृष स्त्रियां

वृष लग्न की स्त्रियां मांसल, आकर्षक शरीर वाली और सुंदर होती हैं। दैहिक सुखों के प्रति उनमें सामान्य से अधिक लालसा हो सकती है।

वृषभ लग्न के जातक, आजीविका

वृषभ लग्न में जन्म लेने वाले व्यक्ति के जीवन का मध्य भाग शुरू की अपेक्षा अधिक सुखकर होता है।

इस लग्न में जन्मे व्यक्ति बैंकिंग, जवाहारात, सुगंधित तेल, व्यवसाय, संगीत, भवन निर्माण, विज्ञापन अथवा प्रचार व्यवसाय में सफल होते है।

वृषभ लग्न और साथी, शुभ ग्रह

शनि और बुध वृषभ लग्न के शुभ और साथी ग्रह है, वृषभ लग्न में दोनों ग्रह शुभ और लाभकारी रहते है। जीवन में उनत्ति और तरक्की प्रदान करते है।

वृषभ लग्न के लिए नुकसान कारक ग्रह

वृषभ लग्न में ब्रहस्पति अष्टमेश होने से अकारक ग्रह हो सकता है या फिर कुछ परेशानियों का करक भी हो सकता है, लेकिन कुंडली में ब्रहस्पति किस भाव में और किस स्तिथि में है,यह देख लेना भी आवश्यक होता है।

वृषभ लग्न वालों को कौन सा रत्न धारण करना चाहिए?

हीरा,सफ़ेद पुखराज,ओपल,सफ़ेद टोपाज,सफ़ेद जिरकॉन

वृषभ लग्न के लिए शुभ रत्न

वृषभ लग्न में जन्में जातकों के लिए हीरा, पन्ना, नीलम शुभ रत्न होते है, एव उपरत्नों में ओपल या सफ़ेद टोपाज, हरा तुरमलिन या हरा ओनिक्स, जमुनियाँ या नीली शुभ उपरत्न होते है।

वृष लग्न, भाग्योदय

इनका भाग्योदय 25,28,36,42 वर्ष में होता है। इनके लिए कन्या तथा वृश्चिक लग्न वाले व्यक्तियों के साथ पार्टनरशिप या बिजनेस सफल होता है। इन्हें हर समय कुछ ना कुछ करते रहने की धुन सवार रहती है। खाली बैठना इन्हें पसंद नहीं होता, निरंतर कोई ना कोई योजना बनाकर उसे कार्य रूप देने का प्रयास करते रहते हैं।

यदि इनके लग्न स्थान में गुरु, शुक्र अथवा चंद्रमा हो या लग्न पर दृष्टि डालते हो तो इस लग्न में जन्मे जातक बड़े ही मनमोहक तेजस्वी प्रतीत होते हैं।


वृषभ लग्न की कुंडली में ग्रहों का प्रभाव

वृषभ लग्न की कुंडली में चंद्र के प्रभाव

वृषभ लग्न में चंद्र तृतीय भाव का स्वामी होता है, और तृतीय भाव नौकर-चाकर, व्यक्ति का प्राकर्म-शक्ति, गुस्सा, एकाउंटिंग के कार्य, लिखाई, मोबाइलफ़ोन, कंप्यूटर, वीरता, बहादुरी, शारीरिक कसरत, कफ-खांसी आदि का प्रतिनिधित्व करता है।
चंद्र का इन सभी कर्यो का प्रतिनिधित्व करने की वजय से, चंद्र का वृषभ लग्न में महत्वपूर्ण योगदान होता है।

इसलिए, वृषभ लग्न में चंद्र का शुभ होना आवश्यक है, अगर चंद्र जन्म कुंडली में शुभ भावों और प्रभावों में है, तो चंद्र शुभ प्रभाव प्राप्त होते है,

और इसी के विपरीत अगर चंद्र अशुभ भावों में है, और पाप ग्रहों के प्रभाव में है,तो चंद्र के अशुभ फल प्राप्त होते है। तृतीय भाव से सम्बंधित कार्यों में परेशानियां उठानी पड़ती है, पारिवारिक फसाद झेलने पड़ते है, और मानसिक परेशानियों से गुजरना पड़ता है।

वृषभ लग्न की कुंडली में सूर्य का प्रभाव

वृषभ लग्न में सूर्य चतुर्थ भाव का स्वामी होते हुए चतुर्थ भाव का प्रतिनिधित्व करता है।

चतुर्थ भाव माता, भूमि, घर, मकान, वाहन, संस्कार, सुख, मित्र, स्थाई संपत्ति, छल-कपट, धन, आदि का प्रतिनिधित्व करता है।
चतुर्थ भाव कुंडली में अपना विशेष महत्व रखता है, चतुर्थ भाव के शुभ होने से व्यक्ति जीवन में धन, जमीन, संपत्ति, वाहन, और माता के सुखों की प्राप्ति करता है।

जैसा कि बताया चतुर्थ भाव का स्वामी सूर्य होता है और सूर्य वृषभ लग्न के स्वामी शुक्र का शत्रु भी है, इसलिए कुंडली में चतुर्थ भाव के स्वामी सूर्य का शुभ अवस्था में होना या शुभ भावों में होना और किसी भी तरह के अशुभ प्रभावों से मुक्त रहना जरूरी है।

अगर सूर्य शुभ अवस्था में है, तो वृषभ लग्न के जातक जीवन में इन सभी सुखों को बड़ी आसानी से भोगते हैं, इसके विपरीत अगर सूर्य कमजोर अवस्था में है, अशुभ भावों में चला गया है, या पाप ग्रहों के संपर्क में है या उस पर पाप ग्रहों की दृष्टि है,

तब ऐसे में वृषभ लग्न के जातक इन सभी सुखों में परेशानियां झेलते हैं और कई बार तो इन सभी चीजों के लिए जीवन में काफी संघर्ष भी करना पड़ता है।

अगर कुंडली में सूर्य शुभ होते हुए भी अशुभ ग्रहों के संपर्क में है या दृष्ट है तब ऐसे में सूर्य की महादशा में ऋवृषभ जातकों को ज्योतिषीय सलाह लेकर माणिक्य धारण करना शुभ हो सकता है।

वृषभ लग्न की कुंडली में मंगल के प्रभाव

वृषभ लग्न की कुंडली में मंगल सप्तम और द्वादश भाव का स्वामी बनता है। मंगल सप्तम भाव का स्वामी होने के कारण घर, परिवार, विवाह, वैवाहिक जीवन, स्त्री, शैय्या सुख, स्वास्थ्य, कलह-अशांति, व्यवसायिक भागीदारी, कारोबार इत्यादि का प्रतिनिधित्व करता है।

किसी भी व्यक्ति के जीवन में सप्तम भाव का विशेष महत्त्व रहता है, क्योंकि सप्तम भाव से व्यक्ति वैवाहिक सुख, शैय्या सुख, सांसारिक सुख, अच्छा स्वास्थ्य सुख, आर्थिक सुखभोगता है,
इसलिए इस भाव का अच्छा होना जीवन में एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

दूसरी ओर मंगल द्वादश भाव यानी कि व्यय भाव का स्वामी भी होता है और द्वादश भाव जीवन में व्यर्थ की हानि, वृद्धावस्था, शारीरिक कष्ट, धन संपदा आदि का प्रतिनिधित्व करता है।

इसलिए वृषभ लग्न के जातकों की कुंडली में मंगल अगर शुभ अवस्था, शुभ भावों में होगा, शुभ ग्रहों की युति में होगा, शुभ ग्रहों की दृष्टि में होगा, तो व्यक्ति जीवन में गृहस्थ सुख, कारोबार, सांसारिक सुखों का भोग करेगा, व्यर्थ की शारीरिक कष्टों से दूर रहेगा, धन हानि नहीं होगी, वृद्धावस्था में भी सुख रहेगा।

इसी के विपरीत अगर वृषभ लग्न में मंगल अशुभ भावों में है, राहु केतु या शनि के साथ युति में है या पाप ग्रहों की दृष्टि में है, तो व्यक्ति का वैवाहिक जीवन, स्वास्थ्य, सांसारिक जीवन, कारोबार, इंद्रिय सुखों की कमी करेगा।

मंगल एक पाप और क्रूर ग्रह होने की वजह से इसका प्रभाव कुछ ज्यादा ही पड़ेगा। विषेशकर मंगल की दशा आने पर,
इसलिए किसी भी वृषभ लग्न के जातक की कुंडली में मंगल का शुभ होना आवश्यक है।

वृषभ लग्न की कुंडली में शुक्र ग्रह के प्रभाव

वृषभ लग्न की कुंडली में शुक्र खुद कुंडली का स्वामी और लग्नेश बनता है। किसी भी कुंडली में लग्नेश बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर किसी भी कुंडली में लग्नेश मजबूत, शुभ, उच्च का रहेगा तो व्यक्ति जीवन में समस्त सुखों को भोगता है।

इसी के विपरीत अगर किसी की भी कुंडली में खुद लग्नेश नीच अथवा अशुभ भावों में या पाप ग्रहों का सताया हुआ होगा, तो व्यक्ति जीवन में परेशानियां उठाता है और कष्टों के साथ सफलता पाता है, इसलिए किसी भी कुंडली में लग्नेश का अच्छा होना अति आवश्यक है।

वृषभ लग्न की कुंडली में लग्नेश शुक्र प्रथम भाव का स्वामी और छठे भाव का स्वामी बनता है।

प्रथम भाव रंग रूप, स्वभाव, हिम्मत, धैर्य, साहस, शरीर सुख, चरित्र, महत्वकांशा, गुण, स्थिरता, कर्म, शक्ति, मानसिकता, व्यक्तित्व, आदि का कारक रहता है,

और छठा भाव कर्ज, रोग, शत्रु, चोट, नौकर-चाकर, कमर, नाभि, कान, चोरी, अपमान, चिंता आदि का कारक रहता है।

कुंडली में अगर शुक्र शुभ भावों में है, अपने मित्रों के साथ युति में है, किसी भी प्रकार के पाप प्रभाव में नहीं है, तो वृषभ जातक जीवन में समस्त सुखों की प्राप्ति करता है। जीवन में उन्नति करता है, सुख भोगता है, किसी भी प्रकार के रोगों से दूर रहता है, कर्ज नहीं होते हैं, नौकर चाकरों का सुख भोगता है।

और इसी के विपरीत अगर वृषभ लग्न की कुंडली में खुद लग्नेश शुक्र कमजोर और पीड़ित अवस्था में है, बुरे ग्रहों के प्रभावों में है, अशुभ भावों में है, तो ऐसे में व्यक्ति को जीवन में परेशानियों का सामना करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है। जीवन में कई प्रकार के कष्टों को झेलना पड़ता है। शारीरिक कष्ट भी आते हैं। कई बार कर्ज को लेकर भी परेशानियां आती हैं और अदालती लफड़े भी झेलने पड़ते हैं।

इसलिए कुंडली में लग्नेश शुक्र का शुभ होना जरूरी है।

वृषभ लग्न की कुंडली में लग्नेश शुक्र को मजबूत करने के लिए हीरा या सफेद जरकन हमेशा के लिए धारण करना चाहिए, जिससे कि शुक्र को मजबूती मिलती है।

वृषभ लग्न की कुंडली में बुध ग्रह के प्रभाव

वृषभ लग्न की कुंडली में बुध अपना एक विशेष महत्व रखता है। पहला तो वृषभ लग्न के स्वामी शुक्र और बुध की मित्रता है और दूसरा वृषभ लग्न की कुंडली में बुध धन, शिक्षा, प्रेम विवाह, अप्रत्याशित लाभ, का कारक होता है।

यह दोनों ही भाव किसी भी कुंडली में बहुत शुभ होते हैं, इसलिए, बुध के वृषभ लग्न की कुंडली में शुभ प्रभाव ही रहते हैं और बुध वृषभ लग्न में महत्वपूर्ण प्रभाव रखता है।

वृषभ लग्न की कुंडली में बुध द्वितीय भाव का स्वामी होता है। द्वितीय भाव धन-संपत्ति, बोलचाल, कुटुंब सुख, वाक-सिद्धि, गला, प्रभाव, बुद्धि, मुख की बनावट, मित्रों आदि का प्रतिनिधित्व करता है।

इसी के साथ बुध पंचम भाव का भी स्वामी होता है और पंचम भाव संतान, शिक्षा, प्रेम, प्रेम की इच्छा, विवाह, शेयर मार्केट, सट्टा, लॉटरी, मंत्री पद या मंत्री का सलाहकार, सूझ-बूझ, मंत्र सिद्धि, कवि, तंत्र मंत्र का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए वृषभ लग्न की कुंडली में बुध एक शुभ ग्रह होता है।

इसी के साथ अगर बुध शुभ भावों में बैठा है या अपने मित्रों के साथ बैठा है, शुभ प्रभावों में है, तो फिर व्यक्ति के जीवन में धन, मान-सम्मान और सुखों की कमी नहीं रहती है। वह इन सुखों का भरपूर लाभ लेता है और जीवन में खूब उन्नति और तरक्की करता है।

इसी के विपरीत अगर बुध अशुभ भावों में बैठा है, या अशुभ, पाप या शत्रु ग्रहों के साथ है, तो बुध अपने इन फलों में कुछ कमी करता है। लेकिन फिर भी बुध अपने शुभ फल देता ही है।

इसलिए वृषभ लग्न की कुंडली में बुध एक सुखकारक और लाभदायक ग्रह होता है। अगर बुध कुंडली में अशुभ भावों में है या शत्रु ग्रहों के साथ है,
तो वृषभ जातकों को पन्ना धारण करके बुध को मजबूत करके उसे प्रबल कर लेना चाहिए और उसके संपूर्ण लाभ प्राप्त करने चाहिए।

वृषभ लग्न की कुंडली में ब्रहस्पति ग्रह के प्रभाव।

वृषभ लग्न की कुंडली में ब्रहस्पति अष्टम भाव और एकादश भाव का स्वामी बनता है।

ब्रहस्पति वृषभ लग्न के स्वामी शुक्र ग्रह का घोर दुश्मन भी है, इन दोनों ही कारणों से वृषभ लग्न की कुंडली में ब्रहस्पत के शुभ प्रभाव नहीं रह पाते हैं।

वैसे भी कुंडली में अष्टम भाव मृत्यु, अल्पायु, शारीरिक कष्ट, तकलीफ, गुप्तांग संबंधित तकलीफ, धन हानि, का भाव होता है और ब्रहस्पति का इस भाव का स्वामी होने की वजह से ब्रहस्पति शुभ लाभ देने वाला नहीं रहता है।

दूसरी ओर कुंडली का एकादश भाव भी इतना शुभ नहीं होता है, इन दोनों ही वजह से ब्रहस्पति, वृषभ लग्न में अपने शुभ प्रभाव देने में असमर्थ ही रहता है।

फिर भी अगर वृषभ लग्न की कुंडली में ब्रहस्पति उच्च का होकर बैठा है, या शुभ भाव में बैठा है, तो बृहस्पति अपनी दशा में लाभ देता है।

कारोबार से संबंधित लाभ देता है, अचानक धन लाभ प्रदान करता है, पैतृक संपत्ति का लाभ देता है, और अच्छा स्वास्थ्य भी प्रदान करता है।

वृषभ लग्न में शनि ग्रह के प्रभाव

वृषभ लग्न में शनि बहुत ही श्रेष्ठ और फलदायक ग्रह होता है। वृषभ लग्न में शनि भाग्य और कर्म का स्वामी होता है और इसके साथ ही शनि वृषभ लग्न के स्वामी ग्रह शुक्र का परम मित्र भी है।

इसलिए किसी भी वृषभ लग्न की कुंडली में शनि एक शुभ लाभ देने वाला ग्रह होता है।

शनि नवम मतलब भाग्य स्थान और दशम मतलब कर्म स्थान का मालिक होता है।

शादी नवम भाव से उच्च शिक्षा, भाग्य, गुरु, शुभ, भक्ति, सत्संग, धर्म और धन का कारक होता है और दशम भाव से राज्य, व्यवसाय, प्रतिष्ठा, निवास स्थान, उच्च शिक्षा, कर्ज प्राप्ति, प्रदेश गमन, पित्र सुख, यश, विदेश प्रवास का कारक होता है।

अगर कुंडली में शनि इन दोनों शुभ भाव के साथ किसी शुभ भाव में विराजमान है, मित्र ग्रहों के साथ में है, तो शनि बहुत ही शुभ फल प्रदान करता है। जीवन में हर तरह से उन्नति दायक होता है। व्यक्ति जीवन में ऊंचाइयों पर पहुंचता है और किसी उच्च पद पर आसीन रहता है। राजनीति और सरकारी क्षेत्रों में लाभ लेने वाला होता है।

इसी के विपरीत अगर शनि किसी अशुभ भाव में स्थित है, तब भी शनि शुभ प्रभाव ही देता है। अगर शनि किसी अशुभ भाव में है या किसी शत्रु राशि के साथ या शत्रु ग्रह के साथ विराजमान है, तो ऐसे में वृष लग्न के जातकों को एक अच्छा नीलम धारण करके शनि को मजबूत करना चाहिए और उसका लाभ लेना चाहिए।

वृषभ लग्न की कुंडली में राहु ग्रह के प्रभाव

वृषभ लग्न की कुंडली में राहु एक कारक ग्रह होता है, क्योंकि शुक्र वृषभ लग्न के स्वामी शुक्र और राहु की आपस में मैत्री है। इस वजह से वृषभ लग्न की कुंडली में राहु शुभ प्रभाव ही देता है।

इसी के साथ साथ अगर राहु शुभ भाव में विराजमान है, तो फिर व्यक्ति जीवन में अचानक ही बहुत ही तरक्की करते हुए ऊंचाइयों पर पहुंचता है और राहु राजयोग भी प्रदान करता है।

इसी के विपरीत अगर राहु अशुभ भाव में और शत्रु ग्रहों के साथ है, तो फिर राहु उस भाव से संबंधित अशुभ फल भी प्रदान करता है।

वृषभ लग्न में केतु ग्रह के प्रभाव

वृषभ लग्न में केतु अगर अपनी मित्र राशि और शुभ भाव में है, तो केतु अपने शुभ फल प्रदान करता है। अचानक उन्नति देता है, तरक्की देता है, विदेश यात्राएं करवाता है, और धन लाभ भी देता है।

इसी के विपरीत अगर केतु अपनी किसी शत्रु राशि में है, अशुभ भाव और ग्रहों के साथ है, तो केतु जीवन में बुरे प्रभाव देते हुए परेशानियां देता है।


vrishabh lagn ke liye ratna । वृषभ लग्न के लिए रत्न

वृषभ लग्न की कुंडली में शुक्र ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न की कुंडली में शुक्र लग्नेश होकर वृषभ लग्न की कुंडली का मालिक होता है, इसलिए वृषभ लग्न में शुक्र एक योगकारक ग्रह होता है।

वृषभ लग्न की कुंडली में अगर शुक्र तृतीय, पंचम, षष्ठ, अष्टम, और द्वादश भाव में है, तो इन भावों में शुक्र कुछ कमजोर पड़ जाते हैं और इन भावों में अपने पूरे शुभ फल प्रदान नहीं कर पाते, क्योंकि तीसरे, छठे ,आठवें, और बारहवें भाव शुभ नहीं होते और पांचवें भाव में शुक्र खुद नीच के हो जाते हैं, इसलिए इन भावों में शुक्र अपने शुभ प्रभाव खो देते हैं।

इसके अलावा अगर शुक्र लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, नवम, दशम और एकादश भाव में स्थित है, तो शुक्र अपने बहुत ही शुभ फल प्रदान करेंगे

एकादश भाव में तो शुक्र उच्च के हो जाते हैं, इन भावों में शुक्र अपने शुभ फल देते हुए जीवन में अच्छी उन्नति और तरक्की प्रदान करते हैं।

अगर वृषभ लग्न की कुंडली में शुक्र किसी भाव में सूर्य अस्त हो कर बैठे हैं, तो ऐसे में शुक्र का रत्न हीरा, सफेद पुखराज या सफेद जरकन जरूर धारण करना चाहिए।

इसके अलावा अगर शुक्र अपनी कम डिग्री में है, तब भी शुक्र का रत्न जरूर धारण करना चाहिए।

और, जब शुक्र तीसरे, पांचवें, छठे, आठवें, और बारहवें भाव में हो तो शुक्र देव का मंत्र जाप करना चाहिए, यंत्र धारण करना चाहिए, उनकी पूजा करनी चाहिए और उनसे संबंधित दान भी करना चाहिए।

वृषभ लग्न की कुंडली में बुध ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न में बुध धन भाव और पंचम भाव का स्वामी होता है। वृषभ लग्न में बुध पंचमेश होने से वृषभ लग्न की कुंडली में योगकारक होता है।

पंचमेश और धन का कारक होन से वृषभ लग्न में बुध शुभ फल प्रदान करता है। इसलिए वृषभ लग्न में बुध का रत्न पन्ना धारण करने से संतान, सुख, भाग्योदय, धन लाभ और कारोबार में सफलता प्राप्त होती है।

यहीं, अगर बुध ग्यारहवें भाव में बैठे तो यहां बुध नीच का हो जाता है और निर्बल होकर शुभ फलदायक नहीं रह जाता है।

वृष लग्न की कुंडली में अगर बुध लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम और दशम भाव में विराजमान हो तो यह शुभ फल प्रदान करते हैं और अपनी दशा महादशा में अच्छी उन्नति तरक्की और धन लाभ प्रदान करते हैं।

बुध लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम और दशम भाव में विराजमान हो तो पन्ना आवश्य धारण करना चाहिए।

और अगर वृषभ लग्न की कुंडली में बुध तृतीय, षष्टम, अष्टम और द्वादश भाव में हो, तो ऐसे में बुध शुभ फल प्रदान करने वाले नहीं रह जाते हैं।

ऐसे में बुद्ध से संबंधित दान किया जा सकता है, बुध यंत्र की पूजा अर्चना की जा सकती है, जिससे कि बुध अपने अशुभ प्रभावों में कमी करें।

वृषभ लग्न की कुंडली में शनि ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न की कुंडली में शनि एक बहुत ही शुभ और योगकारक ग्रह बनते हैं। शनि नवम और दशम भाव के स्वामी बनते हैं।

नवम भाव भाग्य और दशम भाव नौकरी और कारोबार से संबंधित होता है। अगर वृष लग्न की कुंडली में शनि प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम और एकादश भाव में विराजमान होते हैं, तो यह कुंडली में शुभ फल प्रदान करते हैं और अपनी दशाओं और महादशाओं में अच्छा शुभ फल प्रदान करते हुए व्यक्ति को काफी सफलता, उन्नति और तरक्की प्रदान करते हैं।

प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम और एकादश भाव में होने से नीलम आवश्य धारण करना चाहिए।

और, अगर शनि तृतीय, षष्टम, अष्टम, और द्वादश भाव में विराजमान हैं, तो ऐसे में ज्योतिषीय सलाह लेकर ही नीलम रतन धारण करना चाहिए, और शनि से संबंधित पूजा पाठ, मंत्र जप, शनि दर्शन करने चाहिए।

द्वादश भाव में अगर शनि हो तो, यहाँ शनि नीच के हो जाते है। ऐसे में शनि यंत्र धारण करना चाहिए।

वृष लग्न की कुंडली में अगर शनि देव किसी भाव में सूर्य देव से अस्त हो या सूर्य की युति में रहो, तो ऐसे में नीलम रत्न धारण करके शनि को बल प्रदान किया जाना चाहिए।

वृषभ लग्न की कुंडली में सूर्य ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न की कुंडली में सूर्य चतुर्थेश होते हैं। वृषभ लग्न में सूर्य लग्नेश शुक्र के घोर दुश्मन है।

वृषभ लग्न में सूर्य चतुर्थ भाव के स्वामी होते है, चतुर्थ भाव धन, घर, मकान, संपत्ति, वाहन सुख, और माता का होता है।

अगर वृष लग्न में सूर्य शुभ भाव में विराजमान है, तो ऐसे में सूर्य का रत्न माणिक्य सूर्य की दशाओं-महादशाओ में धारण किया जा सकता है।

वृषभ लग्न की कुंडली में जब सूर्य देव द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम, और एकादश भाव में विराजमान हो, तो ऐसे में ज्योतिषीय सलाह से सूर्य का रत्न माणिक्य धारण किया जा सकता है,

और, अगर वृषभ लग्न की कुंडली में सूर्य देव तृतीय, षष्टम, अष्टम, और द्वादश भाव में विराजमान हैं, तो ऐसे में सूर्य अपने अशुभ फल प्रदान करेंगे और सूर्य का रत्न धारण करना काफी नुकसानकारक हो सकता है।

ऐसी स्थिति में सूर्य की पूजा, सूर्य मंत्र जाप, सूर्य को जल देना, पूजा स्थल में सूर्य यंत्र की स्थापना करके उसकी पूजा करना और सूर्य से संबंधित दान पुण्य करने से सूर्य के अशुभ फलों की कमी होती है।

वृषभ लग्न की कुंडली में चंद्र ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न की कुंडली में चंद्र तृतीय भाव का स्वामी होता है, तृतीय भाव एक मारक स्थान कहलाता है।

इसलिए, वृषभ लग्न की कुंडली में चंद्र का रत्न मोती धारण करना वर्जित होता है।

इसके अलावा शुक्र और चंद्र का आपस में विरोध भी है, यही कारण है की वृष लग्न में चंद्र ग्रह का रत्न मोती धारण करने से बचना ही चाहिए।

चंद्र की दशाओं और महादशाओं में चंद्र से संबंधित दान, पूजा, मंत्र जप, और चंद्र यंत्र की पूजा करने से चंद्र के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और सुख शांति बनी रहती है।

वृषभ लग्न की कुंडली में मंगल ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न की कुंडली में मंगल मारक ग्रह होता है। वृषभ लग्न में मंगल सप्तम और द्वादश भाव का स्वामित्व करता है।

सप्तम भाव एक मारक भाव है और द्वादश भाव व्यय भाव होने की वजह से यह दोनों ही भाव अशुभ फल प्रदान करने वाले होते हैं।

इन भावों से पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में तनाव, व्यर्थ के खर्चे होना आदि जैसी परेशानियां आती है। इसके अलावा लग्नेश स्वामी शुक्र और मंगल का आपस में विरोध भी है, इसलिए वृष लग्न में मंगल का रत्न लाल मूंगा नहीं धारण करना चाहिए।

वृष लग्न में जब मंगल की अंतरदशा- महादशा आती है, तब मंगल ग्रह से संबंधित पूजा, मंत्र जप आदि करने से मंगल के अशुभ प्रभावों में कमी आती है।

वृषभ लग्न की कुंडली में मंगल ग्रह का रत्न लाल मूंगा धारण करना वर्जित है।

वृषभ लग्न की कुंडली में बृहस्पति ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न की कुंडली में बृहस्पति मारक होते हैं। दूसरा वृषभ लग्न में शुक्र और ब्रहस्पति आपस में घोर शत्रु भी है, शुक्र राक्षसों के गुरु है, तो दूसरी तरफ ब्रहस्पति देवताओं के गुरु है।

वृषभ लग्न की कुंडली में ब्रहस्पति अष्टम और एकादश भाव के स्वामी होते हैं, दोनों ही भाव अशुभ माने जाते हैं।

इसलिए इन भावों का स्वामी ब्रहस्पति कुंडली में कहीं पर भी हो वह पूरी तरह से शुभ प्रभाव प्रधान नहीं करेगा। इसके अलावा ब्रहस्पति अपनी अंतर्दशा और महादशा में भी अशुभता ही देता है।

इसलिए, इस लग्न कुंडली में ब्रहस्पति से संबंधित दान पुण्य, पूजा पाठ ही करनी चाहिए और ब्रहस्पति की दशा अंतर्दशा में ब्रहस्पति का मंत्र जाप, पूजा पाठ करने से परेशानियां कम होती है।

वृषभ लग्न की कुंडली में ब्रहस्पति का रत्न पीला पुखराज से दूर ही रहना चाहिए और वृषभ लग्न की कुंडली में पीला पुखराज धारण करना वर्जित माना गया है।

वृषभ लग्न की कुंडली में राहु ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न की कुंडली में राहु शुक्र ग्रह का मित्र होता है, इसलिए वृषभ लग्न में राहु के शुभ प्रभाव रहते हैं।

इसी के साथ साथ अगर राहु शुभ भावों में बैठा है, या अपनीमित्र राशि में है, तो वह अपने शुभ फल देता है।

वृषभ लग्न में राहु लग्न, द्वितीय, पंचम, नवम, दशम भाव में बहुत शुभ फल देने वाला होता है। इन भावों में रहने से राहु अपनी दशा-महादशा में जातक को अचानक काफी उन्नति और तरक्की प्रदान करता है। विदेश प्रवास भी देता है।

इसके अलावा अगर राहु तृतीय, चतुर्थ, षष्टम, सप्तम, अष्टम, एकादश, और द्वादश भाव में होने से नुकसानकारी हो सकता है। सप्तम और अष्टम में तो राहु नीच का हो जाता है। इसलिए इन भावों में राहु नुकसानकारी ही रहता है, और अपनी दशाओं और महादशाओं में नुकसानकारी होता है।

जब राहु लग्न, पंचम, नवम, और दशम भाव में हो तब राहु का रत्न गोमेद धारण किया जाना चाहिए और राहु की महादशा में तो गोमेद आवश्य धारण करना चाहिए।

वृषभ लग्न की कुंडली में केतु ग्रह का रत्न धारण

वृषभ लग्न की कुंडली में केतु के शुभ अशुभ प्रभाव केतु की स्थिति के अनुसार होती है।

अगर वृषभ लग्न की कुंडली में केतु अपनी मित्र राशियों में है, तो शुभ प्रभाव देता है। इसके अलावा केतू अगर पंचम, सप्तम, नवम, और दशम भाव में है, तो यह शुभ फल देने वाला होता है।

इसी के अलावा अगर वृष लग्न में केतु लग्न, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, षष्टम, अष्टम, एकादश और द्वादश भाव में है, तो केतु के अशुभ फल ही प्राप्त होते हैं।

वृष लग्न की कुंडली में केतु लग्न और द्वितीय भाव में तो नीच के हो जाते हैं।

इसलिए वृष लग्न की कुंडली में केतु के रत्न लहसुनियां से दूरी बनाकर ही रखनी चाहिए।

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