भारतीय ज्योतिष और पच्छिमी मत, दोनों में रत्न धारण में कुछ भिन्नता है, जहां एक और भारतीय ज्योतिष में लग्न, राशियों और ग्रहों की स्तिथि के अनुसार रत्न धारण का विधान है, वही पच्छिमी देशों में जन्म महीने के अनुसार रत्न धारण किया जाता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है की भारत के ऋषि मुनियों ने ही ज्योतिषशास्त्र की खोज की थी और ग्रहों, नक्षत्रों, राशियों का इतनी गहराई से अध्यन किया गया है जो ज्ञान पच्छिमी ज्योतिषियों के पास नहीं है, यही कारण हो सकता है की वे सीधे महीने के अनुसार ही रत्न धारण करते है, आइये आज की इस पोस्ट में पाश्चात्य मत अनुसार रत्न धारण के बारे में जानकारी प्राप्त करते है।
पच्छिमी देश के विद्वान भी भारतीय ज्योतिष में आस्था रखते है और रत्नों के प्रभावों और चमत्कारों को मानते भी है,
लेकिन उनके और भारतीय ज्योतिष सिद्धांतो में कुछ अंतर है, पच्छिमी ज्योतिष ग्रहों और लग्न (भारतीय ज्योतिष) की अपेक्षा अंग्रेजी महीनों के अनुसार रत्न धारण को प्राथमिकता देते है, उनके अनुसार अंग्रेजी महीनों के अनुसार रत्न धारण करने से व्यक्ति अधिक प्रभावित और लाभवन्वित होता है।
पाश्चात्य मत अनुसार रत्न धारण करने का तरीका:
| महीना | रत्न |
|---|---|
| जनवरी | लाल मूंगा |
| फ़रवरी | एमेथिस्ट |
| मार्च | एक्वामेरीन |
| अप्रैल | हीरा |
| मई | पन्ना |
| जून | सुलेमानी रत्न |
| जुलाई | माणिक्य |
| अगस्त | गोमेद |
| सितम्बर | नीलम |
| अक्टूबर | चंद्रकांत मणि |
| नवंबर | पीला पुखराज |
| दिसंबर | लहसुनियां |
पच्छिमी देश में लाल मूंगा, एमेथिस्ट, एक्वामेरीन, हीरा, पन्ना, सुलेमानी रत्न, माणिक्य, गोमेद, नीलम, चंद्रकांत मणि, पीला पुखराज और लहसुनियां को महीनों के अनुसार धारण करने के लिए निर्धारित किया गया है,
उनकी मान्यता अनुसार हर महीनें में व्यक्ति के जन्म के अनुसार निर्धारित रत्न धारण करने से व्यक्ति भाग्यशाली बनता है और जीवन से सभी सुखों का भोग करता है।