जन्मकुंडली में वैवाहिक और यौन सुख

जन्मकुंडली में वैवाहिक और यौन सुख का विशेष महत्व होता है, धन और संपन्ता के बावजूद , जिस व्यक्ति के जीवन में इस सुख का अभाव होता है, वह व्यक्ति सुखी नहीं होता है।

मानव जीवन में स्त्री और पुरुष के बीच सुंदर सम्बन्धो का बहुत महत्व है, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
जब स्त्री-पुरुष के संबंध की बात आती है तो उन दोनों के जीवन में वैवाहिक या यौन सुख का विशेष महत्व होगा।
पुरुष और स्त्री के बीच के सुंदर और सुखी संबंधों का कारण भी यही है, इसलिए स्त्री और पुरुष के जीवन में अच्छा यौन सुख और खुशियाँ होना बहुत जरूरी है।

ज्योतिष से हम स्त्री और पुरुष के इन संबंधों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, आइए आज की इस पोस्ट में जन्मकुंडली में वैवाहिक और शारीरिक सुख जानने का प्रयास करते हैं।

पाश्चात्य मत अनुसार रत्न धारण

शुभ ग्रह ‘शुक्र’

किसी भी स्त्री और पुरुष की कुंडली में शुक्र का शुभ प्रभाव होना जरूरी है, क्योंकि शुक्र स्त्री और पुरुष दोनों की कुंडली में यौन सुखों का विशेष कारक होता है,

किसी भी पुरुष की कुंडली में शुक्र ग्रह का संबंध सेक्स, जननांग, यौन क्रिया, यौन सुख और शुक्राणुओं पर एकाधिकार बना रहता है।
यही कारण है कि किसी भी कुंडली में जब हम स्त्री और पुरुष के संबंधों की बात करते हैं तो उसमें मुख्य रूप से शुक्र ग्रह की भूमिका देखी जाती है, शुक्र व्यक्ति को जीवन में भौतिक सुखों का भोग कराता है।
जातक की जन्म कुंडली में शुक्र की भूमिका उच्च, निम्न, शुभ और अशुभ आदि के अनुसार देखी जाती है और इसका वैवाहिक सुख या यौन सुख से संबंध ज्ञात होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि कुंडली में शुक्र की भूमिका शुभ हो तो जातक अपने जीवन में शारीरिक, भौतिक, यौन और शय्या सुखों का भरपूर भोग करता है।
शुभ शुक्र व्यक्ति को आकर्षक बनाता है, महिलाएं उसकी ओर आकर्षित होती हैं और पुरुष भी स्त्री पाने के लिए आतुर रहता है,

लग्नानुसार रत्न निर्धारण

लग्न कुण्डली में शुक्र की राशि तुला का अधिकार सप्तम भाव पर होता है और सप्तम भाव से विवाह, वैवाहिक सुख, यौन और शय्या सुख की जानकारी प्राप्त होती है,

इस सप्तम भाव से यौन सुख, शुक्राणु, वैवाहिक सुख, गर्भाशय, नपुंसकता, यौन अंगों की स्थिति देखी जाती है और यह स्वाभाविक है कि शुक्र सप्तम भाव से शुक्र के अधिकार के कारण मजबूत होना चाहिए,

यदि कुंडली में शुक्र बली हो तो जातक को वैवाहिक सुख, यौन सुख और शय्या सुख का सुख मिलता है और शुक्र अशुभ होने पर इन सुखों की बहुत कमी हो जाती है।
ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि ज्योतिषीय उपायों से शुक्र को मजबूत किया जाये और सुखी जीवन व्यतीत करे।

जातक का यौन सुखों के प्रति अनाकर्षक होना और उसमें नपुंसकता के कारण शुक्र ग्रह की अशुभता जिम्मेदार रहती है, जातक वैवाहिक सुख भोगने में असमर्थ होता है, अपने जीवन में नीरसता का अनुभव करता है,

कमजोर और अशुभ शुक्र व्यक्ति में न सिर्फ शारीरिक दोष पैदा करता है,
बल्कि शुक्र से जुड़ी अन्य चीजें जैसे गीत, संगीत, सौंदर्य, यात्रा का शौक, अच्छे कपड़े पहनना, सुंदरता को निहारना, नीरस होना भी जीवन के प्रति उत्साह की कमी पैदा करता है।

भाग्यशाली रत्न

दाम्पत्य जीवन में यौन सुख

सुखी वैवाहिक जीवन और यौन सुख के आनंद के लिए कुंडली में शुक्र का शुभ और मजबूत होना आवश्यक है।

जब शुक्र नीच या अस्त न हो और पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें भाव में शुभ भाव में बैठा हो तो जातक सुखी वैवाहिक जीवन और यौन सुख का भोग करता है।

यदि जन्म कुंडली में शुक्र शुभ और उच्च का हो तो जातक आकर्षक और सुखी वैवाहिक और यौन सुख का भोग करता है।

जन्म कुण्डली में शुक्र यदि अपनी ही वृष या तुला राशि में प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव में बैठा हो तो जातक सुखी वैवाहिक जीवन और यौन सुख का आनंद लेने वाला होता है।

यदि कुंडली में सप्तम भाव का स्वामी और शुक्र दोनों शुभ और बलवान हों तो जातक शानदार वैवाहिक जीवन और यौन सुख का आनंद लेता है।

दाम्पत्य जीवन में यौन सुख की कमी

कुंडली में शुक्र कमजोर और अशुभ होने के कारण जन्मकुंडली में वैवाहिक और यौन सुख की कमी रहती है।

यदि सप्तम भाव मंगल, शनि, राहु, केतु और सूर्य के प्रभाव में हो तो व्यक्ति के जीवन में वैवाहिक और यौन सुखों की कमी होती है।

चतुर्थ भाव में मंगल की उपस्थिति वैवाहिक जीवन में कलह और यौन सुख में कमी का कारण बनती है।

सप्तम भाव में शनि-मंगल की दृष्टि हो तो विवाह में देरी, वैवाहिक सुख में कमी और यौन सुखों में कमी आती है।

सप्तम भाव में मंगल की उपस्थिति जीवन, वैवाहिक सुख और यौन सुख में अंतर को कम करती है।

यदि पति-पत्नी में से किसी की भी कुंडली में वैवाहिक सुख और यौन सुख नहीं है, तो दोनों के जीवन में यौन सुख नहीं होगा।

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